डेली न्यूज़ Hindi 01.07.2023

डेली न्यूज़

  • 01 Jul, 2023
  • 55 min read

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शासन व्यवस्था

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पीएम-प्रणाम योजना और FRP में वृद्धि

प्रिलिम्स के लिये:उचित और लाभकारी मूल्य (FRP), गन्ना, पीएम-प्रणाम योजनामेन्स के लिये:कृषि मूल्य निर्धारण, भारतीय अर्थव्यवस्था में चीनी उत्पादन, गन्ना उद्योग के समक्ष चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों?  

आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने पीएम-प्रणाम (PM-PRANAM) योजना को मंज़ूरी दी है जिसका उद्देश्य जैव उर्वरकों के उपयोग से धरती की उर्वरता को पुनर्स्थापित और पोषित करना है।

  • इसके अतिरिक्त अक्तूबर से शुरू होने वाले 2023-24 सीज़न के लिये गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य को 10 रुपए और बढ़ाकर 315 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है।
  • इसके अतिरिक्त सरकार ने 3.68 लाख करोड़ रुपए के आवंटन के साथ यूरिया सब्सिडी योजना को मार्च 2025 तक बढ़ा दिया है। साथ ही वर्ष 2023-24 के खरीफ सीज़न के लिये 38,000 करोड़ रुपए की पोषक तत्त्व-आधारित सब्सिडी को भी मंज़ूरी दे दी गई है। 

पीएम-प्रणाम योजना:

  • परिचय:
    • पीएम-प्रणाम का मतलब कृषि प्रबंधन हेतु वैकल्पिक पोषक तत्त्वों का संवर्द्धन (Promotion of Alternate Nutrients for Agriculture Management Yojana- PM PRANAM) है।
    • पीएम-प्रणाम की घोषणा पहली बार केंद्र सरकार द्वारा 2023-24 के बजट में की गई थी।
    • इस योजना का उद्देश्य राज्यों को वैकल्पिक उर्वरक अपनाने के लिये प्रोत्साहित करके रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाना है।
  • उद्देश्य:
    • जैव उर्वरकों और जैविक उर्वरकों के साथ उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करना।
    • रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी का बोझ कम करना, जो कि वर्ष 2022-2023 में लगभग 2.25 लाख करोड़ रुपए था। 
  • योजना की मुख्य विशेषताएँ:
    • वित्तपोषण:
      • इस योजना को रसायन और उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग द्वारा संचालित योजनाओं के तहत मौजूदा उर्वरक सब्सिडी की बचत से वित्तपोषित किया जाएगा।
      • पीएम-प्रणाम योजना के लिये अलग से कोई बजट नहीं होगा। 
    • सब्सिडी बचत और अनुदान:
      • केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को सब्सिडी बचत का 50% अनुदान के रूप में प्रदान किया जाएगा।
      • अनुदान में से 70% का उपयोग विभिन्न स्तरों पर वैकल्पिक उर्वरकों और उत्पादन इकाइयों के तकनीकी उत्थान हेतु परिसंपत्तियों के निर्माण में उपयोग किया जा सकता है।
      • शेष 30% का उपयोग किसानों, पंचायतों और उर्वरक कटौती एवं जागरूकता सृजन में शामिल अन्य हितधारकों को पुरस्कृत तथा प्रोत्साहित करने के लिये किया जा सकता है।
    • उर्वरक कटौती की गणना:
      • किसी राज्य द्वारा यूरिया की खपत में कमी की तुलना पिछले तीन वर्षों में यूरिया की औसत खपत से की जाएगी।
      • यह गणना सब्सिडी बचत और अनुदान के लिये पात्रता निर्धारित करेगी। 
    • सतत् कृषि को बढ़ावा:
      • जैव उर्वरकों और जैविक उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित करने से सतत् कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिलेगा।
      • इससे मृदा उर्वरता बढ़ेगी, पर्यावरण प्रदूषण कम होगा और दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता को समर्थन मिलेगा।

जैव उर्वरक:

  • परिचय:
    • इसमें जीवित सूक्ष्मजीवों से समृद्ध एक वाहक माध्यम होता है। जब इसे बीज, मृदा या जीवित पौधों में डाला जाता है, तो यह मृदा के पोषक तत्त्वों को बढ़ाती है या उन्हें जैविक रूप से उपलब्ध कराती है।
    • जैव उर्वरकों में विभिन्न प्रकार के कवक, जड़ बैक्टीरिया या अन्य सूक्ष्मजीव होते हैं। जैसे-जैसे वे मृदा में बढ़ते हैं, वे परपोषी पादप (Host Plants) के साथ पारस्परिक रूप से लाभकारी या सहजीवी संबंध बनाते हैं।
  • सूक्ष्मजीवों के आधार पर जैव उर्वरकों का वर्गीकरण:
    • जीवाणु जैव उर्वरक: राइज़ोबियम, एज़ोस्पिरिलियम, एज़ोटोबैक्टर, फॉस्फोबैक्टीरिया, नोस्टॉक आदि।
    • फंगल जैव उर्वरक: माइकोराइज़ा।
    • शैवालीय जैव उर्वरक: नीला हरा शैवाल (BGA) और एज़ोला। 
    • एक्टिनोमाइसेट्स जैव उर्वरक: फ्रेंकिया।

गन्ने के लिये FRP में हाल ही में किये गए बदलाव: 

  • कैबिनेट ने यह भी निर्णय लिया है कि उन चीनी मिलों के मामले में कोई कटौती नहीं की जाएगी जहां रिकवरी 9.5% से कम है। ऐसे किसानों को आगामी चीनी सीजन में गन्ने के लिये 282.125 रुपए प्रति क्विंटल के बजाय 291.975 रुपए प्रति क्विंटल मिलेंगे।

उचित और लाभकारी मूल्य (FRP): 

  • परिचय:
    • FRP सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य है जो चीनी मिलें किसानों को उनसे खरीदे गए गन्ने के लिये भुगतान करने के लिये बाध्य हैं।
  • भुगतान और समझौता:
    • चीनी मिलों को कानूनी तौर पर किसानों को उनके गन्ने के लिये FRP का भुगतान करना आवश्यक है।
    • चीनी मिलें किसानों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने का विकल्प चुन सकती हैं जिससे उन्हें किस्तों में FRP का भुगतान करने की अनुमति मिल सके।
    • विलंबित भुगतान पर प्रतिवर्ष 15% तक का ब्याज शुल्क लग सकता है तथा चीनी आयुक्त मिलों की संपत्तियों को संलग्न करके अवैतनिक FRP की वसूली कर सकते हैं।
  • शासकीय विनियम:
    • गन्ने का मूल्य निर्धारण आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA), 1955 के तहत जारी गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के वैधानिक प्रावधानों द्वारा नियंत्रित होता है। 
    • नियमों के अनुसार FRP का भुगतान गन्ना डिलीवरी के 14 दिनों के भीतर किया जाना चाहिये।
  • निश्चय एवं घोषणा:
  • कारक:
    • FRP विभिन्न कारकों को ध्यान में रखता है जिसमें गन्ना उत्पादन की लागत, वैकल्पिक फसलों से प्राप्त निधि, कृषि वस्तुओं की कीमतों में रुझान, उपभोक्ताओं को चीनी की उपलब्धता, चीनी का बिक्री मूल्य, गन्ने से चीनी की रिकवरी और गन्ना उत्पादकों के लिये आय सीमा शामिल है।

गन्ना: 

  • तापमान: गर्म और आर्द्र जलवायु के साथ 21-27°C के बीच।
  • वर्षा: लगभग 75-100 सेमी.।
  • मिट्टी का प्रकार: गहरी समृद्ध दोमट मिट्टी।
  • शीर्ष गन्ना उत्पादक राज्य: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार।
  • ब्राज़ील के बाद भारत गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
  • इसे बलुई दोमट से लेकर चिकनी दोमट मिट्टी तक सभी प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है क्योंकि इसके लिये अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है।
  • इसमें बुवाई से लेकर कटाई तक शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है।
  • यह चीनी, खांडसारी, गुड़ और शीरे का मुख्य स्रोत है।
  • चीनी उपक्रमों को वित्तीय सहायता बढ़ाने की योजना (SEFASU) और जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीतिगन्ना उत्पादन एवं चीनी उद्योग को समर्थन देने के लिये सरकार की दो योजनाएँ हैं।
  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  प्रिलिम्स:निम्नलिखित जीवों पर विचार कीजिये: (2013)एगैरिकस नॉस्टॉक स्पाइरोगाइराउपर्युक्त में से कौन सा/से जैव उर्वरक के रूप में प्रयुक्त होता/होते है/हैं?(a) केवल  1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 3उत्तर: (B)प्रश्न. गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) द्वारा अनुमोदित किया गया है: (2015)(a) आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति
(b) कृषि लागत और मूल्य आयोग
(c) विपणन और निरीक्षण निदेशालय, कृषि मंत्रालय
(d) कृषि उपज बाज़ार समितिउत्तर: (A)प्रश्न. भारत में गन्ने की खेती के वर्तमान रुझानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)बीज सामग्री में पर्याप्त बचत तब होती है जब ‘बड चिप सेटलिंग्स’ को नर्सरी में उगाया जाता है और मुख्य कृषि भूमि में प्रत्यारोपित किया जाता है। जब सेट का सीधा रोपण किया जाता है, तो एक कलिका सेट्स का अंकुरण प्रतिशत कई सेट्स की तुलना में  बेहतर होता है। खराब मौसम की स्थिति में यदि सेट्स का सीधे रोपण होता है तब एक कलिका सेट्स का जीवित बचना बड़े सेट्स की तुलना में बेहतर होता है । गन्ने की खेती ऊतक संवर्द्धन से तैयार की गई सेटलिंग्स से की जा सकती है।उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 4
(d) केवल 2, 3 और 4उत्तर: (C)व्याख्या:ऊतक संवर्द्धन प्रौद्योगिकीऊतक संवर्द्धन एक ऐसी तकनीक है जिसमें पौधों के टुकड़ों को प्रयोगशाला में संवर्द्धित तथा विकसित किया जाता है।यह वर्तमान व्यावसायिक किस्मों के रोग-मुक्त बीज गन्ने का तीव्रता से उत्पादन और आपूर्ति करने का एक नया तरीका प्रदान करता है।यह मातृ पौधे का क्लोन बनाने के लिये विभज्योतक का उपयोग करता है।यह आनुवंशिक पहचान को भी सुरक्षित रखता है।ऊतक संवर्द्धन तकनीक, अत्यधिक व्यय और शारीरिक सीमाओं के कारण, अलाभकारी सिद्ध हो रही है।बड चिप टेक्नोलॉजीऊतक संवर्द्धन एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में बीजों के त्वरित प्रजनन को सक्षम बनाता है, साथ ही इसके द्रव्यमान को कम करता है।यह विधि दो से तीन कलियों के रोपण की पारंपरिक विधि की तुलना में अधिक किफायती और सुविधाजनक सिद्ध हुई है।रोपण के लिये उपयोग की जाने वाली बीज सामग्री पर पर्याप्त बचत के साथ रिटर्न भी अपेक्षाकृत उच्च प्राप्त होता है।अतः, कथन 1 सही है।शोधकर्त्ताओं ने पाया है कि दो कलियों वाले सेट उच्च उपज के साथ लगभग 65 से 70% अंकुरण करते हैं। अतः कथन 2 सही नहीं है। दो कलियों से अधिक वाले सेट खराब मौसम में अधिक जीवित रहते हैं, लेकिन रासायनिक उपचार से संरक्षित करने पर एकल कलिका वाले सेट भी 70% अंकुरण करते हैं। अतः कथन 3 सही नहीं है।ऊतक संवर्द्धन का उपयोग गन्ने के पौधों को अंकुरित के लिये किया जा सकता है जिन्हें बाद में खेत में प्रत्यारोपित किया जा सकता है।अतः कथन 4 सही है।अत: विकल्प (C) सही उत्तर है। 

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

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राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन

प्रिलिम्स के लिये:राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन, NEPSERBसाइन लैंग्वेज एस्ट्रोलैब,  CSIR-NPLमेन्स के लिये:राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Science and Technology),  भारत सरकार ने राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (National Research Foundation- NRF) विधेयक, 2023 को संसद में पेश करने की स्वीकृति दे दी।

NRF विधेयक 2023 की विशेषताएँ: 

  • NRF की स्थापना:
    • संसद से मंज़ूरी मिलने के बाद यह विधेयक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy- NEP) की सिफारिशों के अनुरूप देश में वैज्ञानिक अनुसंधान को उच्चस्तरीय रणनीतिक दिशा प्रदान करने के लिये राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन नाम के एक शीर्ष निकाय की स्थापना करेगा जिसकी कुल अनुमानित लागत पाँच वर्षों की अवधि (2023-28) के दौरान 50,000 करोड़ रुपए होगी।
  • SERB का समावेशन:
    • यह विधेयक 2008 में संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (Science and Engineering Research Board- SERB) को भी निरस्त कर देगा और इसे NRF में सम्मिलित कर देगा, जिसका एक विस्तृत दायरा है और जो SERB की गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों को भी कवर करता है।
  • प्रशासन एवं शासन:
    • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology- DST) NRF का प्रशासनिक विभाग होगा जो एक शासी बोर्ड (Governing Board) द्वारा शासित होगा। शासी बोर्ड में विभिन्न विषयों से संबंधित प्रख्यात शोधकर्त्ता और पेशेवर शामिल होंगे। 
    • प्रधानमंत्री इस बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होंगे और केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्री पदेन उपाध्यक्ष होंगे। 
    • NRF का कामकाज़ भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार की अध्यक्षता में एक कार्यकारी परिषद द्वारा प्रशासित होगा।

राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन क्या है? 

  • परिचय:
    • यह एक नीतिगत ढाँचा बनाने और नियामक प्रक्रियाओं को स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करेगा ताकि अनुसंधान एवं विकास पर उद्योग द्वारा सहयोग तथा खर्च में वृद्धि को प्रोत्साहित किया जा सके।
  • उद्देश्य:
    • NRF का लक्ष्य वैज्ञानिक अनुसंधान में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को शामिल करना है, क्योंकि वर्तमान में भारत में लगभग 40,000 उच्च शिक्षण संस्थानों में से 1% से भी कम अनुसंधान में लगे हुए हैं
    • NRF सक्रिय शोधकर्त्ताओं को उम्र की परवाह किये बिना NRF प्रोफेसरशिप लेने और मौजूदा संकाय के साथ सहयोग करने के लिये प्रोत्साहित करके विश्वविद्यालयों में अनुसंधान क्षमता का निर्माण करने की योजना बना रहा है।
    • यह इन विश्वविद्यालयों में युवा शोधकर्त्ताओं को डॉक्टरेट और पोस्ट-डॉक्टरल फेलोशिप प्रदान करेगा।
  • महत्त्व:
    • नेचुरल साइंस के अलावा अन्य अनुसंधान को बढ़ावा:
      • NRF न केवल प्राकृतिक विज्ञान बल्कि मानविकी, सामाजिक विज्ञान तथा कला में भी अनुसंधान को वित्तपोषित करेगा तथा इन्हें प्रोत्साहित करेगा।
      • यह एकीकरण रचनात्मकता, आलोचनात्मक विचार और संचार कौशल को बढ़ावा देने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
      • वर्तमान में इन क्षेत्रों में अनुसंधान के लिये निधियन के स्रोत सीमित हैं। सामाजिक विज्ञान, भारतीय भाषाओं और ज्ञान प्रणालियों, कला एवं मानविकी के लिये निदेशालय स्थापित करना NRF के लक्ष्यों में से एक है।
    • राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ:
      • यह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को चिह्नित करने का लक्ष्य रखता है जहाँ विज्ञान व प्रौद्योगिकी के हस्तक्षेप स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, सतत् बुनियादी ढाँचे, बेहतर परिवहन और सुलभ एवं किफायती स्वास्थ्य सेवा जैसे राष्ट्रीय उद्देश्यों में योगदान कर सकते हैं।
    • वित्तपोषण में वृद्धि:
      • इसका उद्देश्य भारत में सरकारी और निजी दोनों स्रोतों से वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये वित्तपोषण में वृद्धि करना है।
        • वर्तमान में अनुसंधान और विकास पर भारत का खर्च इसके सकल घरेलू उत्पाद के 0.7% से कम है, जबकि मिस्र या ब्राज़ील जैसे देश भी इससे अधिक खर्च करते हैं।
        • अमेरिका, चीन, इज़रायल, जापान और दक्षिण कोरिया वैज्ञानिक अनुसंधान पर अपने संबंधित सकल घरेलू उत्पाद का 2 से 5% के बीच खर्च करते हैं।
      • अपर्याप्त वित्तपोषण ने भारत में अनुसंधान उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। NRF के लिये पाँच वर्षों में 50,000 करोड़ रुपए का प्रारंभिक आवंटन पर्याप्त वृद्धि का प्रतिनिधित्व तो नहीं करता है लेकिन NRF को पहचान मिलने तथा प्रगति प्रदर्शित होने के साथ इसमें वृद्धि की उम्मीद है।

भारत में अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार को बढ़ावा देने वाली पहलें:

आगे की राह

  • भारत में NRF की स्थापना वैज्ञानिक अनुसंधान परिदृश्य में क्रांति लाने की अपार संभावनाएँ रखती है। सामाजिक विज्ञान सहित अनुसंधान भागीदारी को व्यापक बनाकर तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करने के साथ फंडिंग में वृद्धि करके NRF महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान कर सकता है, इसके साथ ही अनुसंधान आउटपुट तथा नवाचार में भी वृद्धि कर सकता है।
  • NRF’s के प्रभावी कार्यान्वयन के साथ भारत का वैज्ञानिक अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र महत्त्वपूर्ण सुधार के लिये तैयार है, जिसके परिणामस्वरूप देश को परिवर्तनकारी परिणाम प्राप्त होंगे।

स्रोत: पी.आई.बी.


जैव विविधता और पर्यावरण

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ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम

प्रिलिम्स के लिये:ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम, केंद्रीय बजट 2023-24, कार्बन बाज़ारCO2 उत्सर्जनपुनर्योजी कृषि, ICFRE, ग्रीनवॉशिंगमेन्स के लिये:ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम, इसका महत्त्व और संबंधित चिंताएँ

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2023 के लिये ‘ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP)’ कार्यान्वयन नियमों का मसौदा अधिसूचित किया है।

  • प्रतिस्पर्द्धी बाज़ार-आधारित दृष्टिकोण का लाभ उठाने और विभिन्न हितधारकों के स्वैच्छिक पर्यावरणीय कार्यों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से पहली बार वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में इसकी घोषणा की गई। 

ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम: 

  • परिचय:
    • ‘ग्रीन क्रेडिट’ का अर्थ है किसी निर्दिष्ट गतिविधि के लिये प्रदान की जाने वाली प्रोत्साहन की एकल इकाईइसका पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
    • ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम एक ऐसे तंत्र के रूप में है जो घरेलू कार्बन बाज़ार के पूरक के रूप में कार्य करता है।
    • यद्यपि घरेलू कार्बन बाज़ार पूरी तरह से CO2 उत्सर्जन में कटौती पर केंद्रित है, ग्रीन क्रेडिट सिस्टम का लक्ष्य कंपनियों, व्यक्तियों और स्थानीय निकायों द्वारा स्थायी कार्यों को प्रोत्साहित करते हुए अन्य पर्यावरणीय दायित्वों को भी पूरा करना है।
    • ग्रीन क्रेडिट व्यापार योग्य होंगे और इसे अर्जित करने वाले इन क्रेडिट को प्रस्तावित घरेलू बाज़ार मंच पर बिक्री के लिये रख सकेंगे।
    • ग्रीन क्रेडिट विनिमेय होंगे और जो लोग उन्हें अर्जित करेंगे वे उन्हें एक प्रस्तावित घरेलू बाज़ार की सहायता से बेच भी सकेंगे
  • ग्रीन क्रेडिट संबंधी गतिविधियाँ:
    • वृक्षारोपण-आधारित ग्रीन क्रेडिट: देश भर में हरित आवरण में वृद्धि करने के लिये संबद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये वृक्षारोपण आधारित गतिविधियाँ।
    • जल-आधारित ग्रीन क्रेडिट: अपशिष्ट जल के उपचार और पुन: उपयोग सहित जल संरक्षण, जल संचयन तथा जल उपयोग दक्षता/बचत को बढ़ावा देना। 
    • सतत् कृषि-आधारित ग्रीन क्रेडिट: उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य और उत्पादित भोजन के पोषण मूल्य में सुधार हेतु प्राकृतिक एवं पुनर्योजी कृषि प्रथाओं तथा भूमि बहाली को बढ़ावा देना।
    • अपशिष्ट प्रबंधन-आधारित ग्रीन क्रेडिट: संग्रहण, पृथक्करण और उपचार सहित अपशिष्ट प्रबंधन के लिये टिकाऊ तथा बेहतर प्रथाओं को बढ़ावा देना।
    • वायु प्रदूषण न्यूनीकरण-आधारित ग्रीन क्रेडिट: वायु प्रदूषण को कम करने तथा अन्य प्रदूषण उपशमन गतिविधियों के उपायों को बढ़ावा देना।
    • मैंग्रोव संरक्षण और पुनर्स्थापन-आधारित ग्रीन क्रेडिट: मैंग्रोव के संरक्षण और पुनर्स्थापन के उपायों को बढ़ावा देना।
    • इकोमार्क-आधारित ग्रीन क्रेडिट: निर्माताओं को अपने सामान एवं सेवाओं के लिये ‘इकोमार्क’ लेबल प्राप्त करने के लिये प्रोत्साहित करना। 
    • सतत् भवन और बुनियादी ढाँचे पर आधारित ग्रीन क्रेडिट: सतत् प्रौद्योगिकियों एवं सामग्रियों का उपयोग करके इमारतों और अन्य बुनियादी ढाँचे के निर्माण को प्रोत्साहित करना।
    • इन कार्यक्रमों के माध्यम से प्रत्येक ग्रीन क्रेडिट गतिविधि के लिये सीमाएँ और बेंचमार्क विकसित किये जाएंगे।
  • प्रशासन:
  • महत्त्व:
    • ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम निजी क्षेत्र के उद्योगों और कंपनियों के साथ-साथ अन्य संस्थाओं को भी अन्य कानूनी ढाँचे से उत्पन्न अपने मौजूदा दायित्वों को पूरा करने के लिये प्रोत्साहित करेगा जो कि ग्रीन क्रेडिट उत्पन्न करने या खरीदने के लिये प्रासंगिक गतिविधियों के साथ जुड़ने में सक्षम हैं।
    • दिशा-निर्देश पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की मात्रा निर्धारित करने और समर्थन करने के लिये तंत्र को एक साथ लाते हैं तथा  जैविक कृषि किसानों तथा FPO के लिये बहुत मददगार होंगे।
    • यह अपनी तरह का पहला उपकरण है जो हरित परियोजनाओं को केवल कार्बन से परे इष्टतम रिटर्न प्राप्त करने की अनुमति देने के लिये कई पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को महत्त्व देने और पुरस्कृत करने का प्रयास करता है।

ग्रीन क्रेडिट तंत्र के संबंध में चिंताएँ: 

  • विशेषज्ञों को चिंता है कि ग्रीन क्रेडिट की बाज़ार-आधारित व्यवस्था से ग्रीनवॉशिंग की स्थिति बन  सकती है।
    • ग्रीनवॉशिंग से तात्पर्य सकारात्मक छवि बनाने के लिये पर्यावरणीय स्थिरता या उपलब्धियों के बारे में झूठे या अतिरंजित दावे करने की प्रथा से है, जबकि वास्तव में महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय लाभ नहीं मिलते हैं।  
  • डर यह है कि कंपनियाँ या संस्थाएँ पर्यावरणीय मुद्दों के समाधान के लिये पर्याप्त प्रयास किये बिना ग्रीन क्रेडिट उत्पन्न करने हेतु प्रतीकात्मक या सतही गतिविधियों में संलग्न हो सकती हैं।
  • तत्काल उत्सर्जन में कमी लाने और सरकार द्वारा निर्देशित अधिक परिवर्तनकारी प्रयासों के बजाय निगरानी एवं धोखाधड़ी की रोकथाम के लिये संसाधनों के आवंटन में इन तंत्रों की प्रभावशीलता को लेकर चिंताएँ भी हैं।

आगे की राह:

  • यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण होगा कि कार्यप्रणाली और मानक मज़बूत हों तथा अतिरिक्त रणनीतियाँ जो बाज़ार की व्यवहार्यता और हरित क्रेडिट की पर्याप्त मांग पैदा करेंगी।
  • ग्रीन क्रेडिट सिस्टम के सावधानीपूर्वक मूल्यांकन और कार्यान्वयन की आवश्यकता है, विशेष रूप से वृक्षारोपण और वनीकरण पर इसका ध्यान केंद्रित है।
  • यह महत्त्वपूर्ण है कि अनसुलझे वन स्वामित्व और शासन अधिकार, पारिस्थितिकी और जैव विविधता चुनौतियों तथा कार्बन क्रेडिट योजनाओं की वैश्विक आलोचना पर विचार किया जाए।
  • इन पहलुओं को संबोधित करने के लिये आंतरिक चर्चा और सार्वजनिक परामर्श महत्त्वपूर्ण हैं।
  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न   प्रिलिम्स:प्रश्न.  “कार्बन क्रेडिट” के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा सही नहीं है?  (वर्ष 2011)(A) क्योटो प्रोटोकॉल के साथ कार्बन क्रेडिट सिस्टम की पुष्टि की गई थी।
(B) कार्बन क्रेडिट उन देशों या समूहों को दिया जाता है जिन्होंने ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अपने उत्सर्जन कोटा से कम कर दिया है।
(C) कार्बन क्रेडिट सिस्टम का लक्ष्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की वृद्धि को सीमित करना है।
(D) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा समय-समय पर निर्धारित मूल्य पर कार्बन क्रेडिट का कारोबार किया जाता है।उत्तर: (D)व्याख्या:उत्सर्जन व्यापार, जैसा कि क्योटो प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 17 में निर्धारित किया गया है, उन देशों को इसके व्यापार करने की अनुमति देता है जिनके पास और अधिक उत्सर्जन का अधिकार है किंतु उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया है। इस अतिरिक्त उत्सर्जन क्षमता को उन देशों को बेच सकते हैं जो अपने लक्ष्य से अधिक उत्सर्जन कर रहे हैं।यदि कोई देश हाइड्रोकार्बन की लक्षित मात्रा से कम का उत्सर्जन करता है तो वह अपने अधिशेष क्रेडिट को उन देशों को बेच सकता है जो उत्सर्जन कटौती खरीद समझौते (ERPA) के माध्यम से अपने क्योटो स्तर के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं करते हैं।प्रमाणित उत्सर्जन कटौती (CER) सीडीएम परियोजनाओं द्वारा प्राप्त उत्सर्जन में कमी के लिये स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) के कार्यकारी बोर्ड द्वारा जारी उत्सर्जन इकाइयों (या कार्बन क्रेडिट) का एक प्रकार है।यह क्योटो प्रोटोकॉल के नियमों के तहत एक DOE (नामित परिचालन इकाई) द्वारा सत्यापित है।उपयोग की सतत् प्रथाओं और पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग कार्बन-क्रेडिट उत्पन्न करते हैं जिनका व्यापार किया जा सकता है। इस प्रकार यह जीएचजी उत्सर्जन में कमी लाता है क्योंकि यह एक प्रतिस्पर्द्धी और लाभकारी बाज़ार विकसित करता है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) ने कार्बन क्रेडिट व्यवस्था को “बाज़ार उन्मुख तंत्र” के रूप में विकसित किया। अतः विकल्प (D) सही उत्तर है
मेन्स:प्रश्न. क्या यू.एन.एफ.सी.सी.सी. के अधीन स्थापित कार्बन क्रेडिट और स्वच्छ विकास यांत्रिकत्वों का अनुसरण जारी रखा जाना चाहिये, यद्यपि कार्बन क्रेडिट के मूल्य में भारी गिरावट आई है? आर्थिक संवृद्धि के लिये भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की दृष्टि से चर्चा कीजिये। (2014)

स्रोत: डाउन टू अर्थ 


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

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अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर नारीवादी दृष्टिकोण

प्रिलिम्स के लिये:द्वितीय विश्व युद्धशीत युद्धमेन्स के लिये:अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रति नारीवादी दृष्टिकोण

चर्चा में क्यों? 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदलती वैश्विक व्यवस्था में गैर-राज्य अभिनेताओं, जातीय तनाव और शीत युद्ध का उदय देखा गया। इसने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (IR) के लिये वैकल्पिक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया जिसमें नारीवादी परिप्रेक्ष्य भी शामिल है जो अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र को लैंगिक आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से देखता है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के नारीवादी परिप्रेक्ष्य की उत्पत्ति: 

  • प्रत्यक्षवादी और उत्तर-सकारात्मकवादी:
    • अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (IR) में नारीवादी परिप्रेक्ष्य वर्ष 1980 के दशक में प्रत्यक्षवादी और उत्तर-प्रत्यक्षवादी विद्वानों के बीच “तीसरी बहस” से उभरा था।
      • प्रत्यक्षवादियों का मानना था कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का एक मूल्य-तटस्थ क्षेत्र है जिसमें अराजकता और राष्ट्र राज्य जैसी परिभाषाएँ एवं संरचनाएँ तय हैं।
      • उत्तर-सकारात्मकवादियों ने इस दृष्टिकोण को चुनौती दी और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आलोचनात्मक विश्लेषण, बहुलवाद एवं विविधता का आह्वान किया (जो उस समय तक यथार्थवादी और उदारवादी दृष्टिकोण के साथ हावी था)।

नोट: 

  • यथार्थवादियों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र अराजकता की स्थिति में है (राष्ट्र राज्यों पर शासन करने तथा उन्हें क्या करना है यह बताने के लिये कोई व्यापक संप्रभु शक्ति नहीं है)।
    • इसलिये राष्ट्र लगातार ‘सत्ता की राजनीति’ में शामिल रहते हैं तथा अपने हितों एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं।
  •  दूसरी ओर उदारवादी विद्वान सहयोग को प्राथमिकता देते हैं। हालाँकि वे वैश्विक व्यवस्था के अराजक होने के आधार को लेकर सहमत हैं, उनका तर्क है कि सत्ता के बजाय राष्ट्र अपने हितों की रक्षा के लिये सक्रिय रूप से गठबंधन करते हैं।
  • नारीवादी:
    • नारीवादियों ने इन दृष्टिकोणों में निहित मानव स्वभाव की पुरुषों की धारणा को चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि इसने मानव स्वभाव के अभिन्न पहलुओं के रूप में सामाजिक प्रजनन और विकास की उपेक्षा की है।  
    • वे वैश्विक व्यवस्था को एक सामाजिक रूप से निर्मित पदानुक्रम के रूप में देखते हैं जिसने लैंगिक अधीनता को कायम रखा है।
    • नारीवादी युद्ध, संघर्ष और कूटनीति में महिलाओं के अनुभवों को हाशिये पर रखने की आलोचना करते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं की आवाज़, ज्ञान, दृष्टिकोण और अनुभवों को अक्सर पुरुष-केंद्रित “सार्वभौमिक” अनुभव के तहत अनदेखा या समाहित कर दिया जाता है।

युद्ध और संघर्षों पर चर्चा में महिलाओं की भागीदारी:

  • अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष में महिलाओं को अक्सर कमज़ोर और सुरक्षा की आवश्यकता के रूप में चित्रित किया जाता है, लेकिन इस परिप्रेक्ष्य ने उन्हें युद्ध की चर्चाओं और प्रक्रियाओं में भाग लेने से वंचित रखा है।
  • युद्ध और संघर्ष के क्षेत्र का एक पुरुष प्रधानता है, जहाँ महिलाओं को युद्ध और संघर्षों के दौरान उनकी सक्रिय भूमिका के बावजूद पूरी तरह से अदृश्य कर दिया जाता है, जैसे कि घायल व्यक्तियों की देखभाल करना तथा अपने युद्धग्रस्त परिवारों का समर्थन करने के लिये वेश्यावृत्ति की ओर रुख करना।
  • सुरक्षा के विमर्श में भी बलात्कार और यौन हिंसा के माध्यम से महिलाओं को विशेष रूप से निशाना बनाने को युद्ध के प्रभाव के रूप में देखा जाता है, न कि जातीय सफाए तथा नरसंहार के लिये राष्ट्रों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक प्रमुख सैन्य रणनीति के रूप में।

विभिन्न नारीवादी सिद्धांतों का IR में मौजूदा चुनौतियों को समझने में योगदान: 

  • उदारवादी नारीवाद:
    • उदारवादी नारीवादी सिद्धांत मूल रूप से IR के पारंपरिक विचारों को चुनौती नहीं देता है, यह विषय-वस्तु पर सवाल उठाता है। उदारवादी नारीवाद वैश्विक राजनीति में लिंग अंतर की भूमिका और यौन हिंसा एवं तस्करी के रूप में महिलाओं पर युद्ध के असंगत प्रभाव को देखते हैं।
    • वे उच्च-स्तरीय राजनीति में अधिक महिला भागीदारी का आह्वान करते हैं और तर्क देते हैं कि अधिक महिला प्रतिनिधि की उपस्थिति मानवीय नीतियों को शांतिपूर्ण एवं सुविधाजनक बनाएगी।
  • रचनावादी नारीवाद:
    • रचनावादी नारीवादी सिद्धांत यह दर्शाता है कि वैश्विक राजनीति में लैंगिक पहचान की क्या भूमिका है। यह लिंग को मुख्य घटक के रूप में देखता है जो संरचनाओं और व्यक्तिगत संबंधों को प्रभावित करता है।
      • यह लिंग के उस विचार पर ज़ोर देता है कि यह कैसे असमान वैश्विक भौतिक स्थितियों को कायम रखता है।
    • जबकि उदारवादी नारीवाद मौजूदा संरचनाओं के भीतर महिलाओं के लिये औपचारिक समानता और व्यक्तिगत अधिकारों को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करता है, रचनावादी नारीवाद इस बात की जाँच करता है कि लिंग का सामाजिक रूप से निर्माण किया जाए एवं सच्ची समानता के लिये सामाजिक मानदंडों और संबंधों को बदलने का प्रयास करता है।
  • उत्तर संरचनावादी नारीवाद:
    • एक उत्तर संरचनावादी नारीवादी दृष्टिकोण IR में आदेश/अराजकता, विकसित/ अविकसित, राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय आदि जैसे द्विआधारी भाषायी विरोधों के बारे में चर्चा करता है, जो स्त्री के ऊपर पुरुषत्व को कायम रखता है और उसे सशक्त बनाने का प्रयास करता है।
    • वे इस दावे के अत्यधिक आलोचक हैं कि उच्च-स्तरीय राजनयिक पदों पर अधिक महिलाएँ शांतिवादी नीतियों को बढ़ावा देंगी क्योंकि यह स्त्री के रूप में कुछ विशेषताओं को और अधिक आवश्यक बनाने एवं सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।
  • उत्तर औपनिवेशिक नारीवाद:
    • यह सभी क्षेत्रों और संस्कृतियों में महिलाओं के अनुभव की सार्वभौमिकता की धारणा को चुनौती देने का प्रयास करता है।
    • यह वैश्विक तौर पर दक्षिण में महिलाओं को शक्तिहीन, अभावग्रस्त, असहाय या एक समरूप श्रेणी के रूप में देखने के उदारवादी नारीवादियों के दृष्टिकोण की विशेष रूप से आलोचना करता है।

वर्तमान समय में IR के प्रति नारीवादी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता:

  • लिंग असमानता: 
    • नारीवादी दृष्टिकोण लैंगिक असमानताओं को दूर करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है तथा असमानता को बनाए रखने वाली पारंपरिक शक्ति संरचनाओं को चुनौती देता है।
    • यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि लिंग किस प्रकार वैश्विक राजनीति को आकार देता है जिसमें सुरक्षा, विकास एवं मानवाधिकारों से संबंधित मुद्दे भी शामिल हैं।
  • शांति एवं सुरक्षा: 
    • नारीवादी विद्वानों और कार्यकर्त्ताओं ने सुरक्षा की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दी है तथा मानव सुरक्षा को शामिल करने हेतु इस अवधारणा को व्यापक बनाया है, जिसमें व्यक्तियों और समुदायों का कल्याण एवं अधिकार शामिल हैं। 
    • उन्होंने महिलाओं पर संघर्षों के असंगत प्रभाव पर प्रकाश डाला है, शांति प्रक्रियाओं में महिलाओं को शामिल करने का समर्थन किया है और सुरक्षा मुद्दे के रूप में लिंग आधारित हिंसा को संबोधित करने के महत्त्व पर ज़ोर दिया है।
  • वैश्विक शासन: 
    • IR के प्रति नारीवादी दृष्टिकोण वैश्विक शासन और संस्थानों की पुरुष-केंद्रित प्रकृति को चुनौती देता है।
    • यह निर्णयकारी निकायों में अधिक लैंगिक समानता का आह्वान करता है और वैश्विक नीतियों तथा एजेंडे को आकार देने में महिलाओं के दृष्टिकोण व विचारों को शामिल करने को बढ़ावा देता है।
    • यह देखभाल कार्य की मान्यता और अधिक न्यायसंगत तरीकों से संसाधनों एवं शक्ति के पुनर्वितरण पर भी ज़ोर देता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय नारीवाद: 
    • अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रति नारीवादी दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय नारीवादी नेटवर्क और आंदोलनों के महत्त्व को रखांकित करता है। यह विश्व स्तर पर महिलाओं के संघर्षों के अंतर्संबंध तथा आम चुनौतियों से निपटने के लिये सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता को स्वीकार करता है।
    • यह लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में सीमा पार एकजुटता और सहयोग के महत्त्व पर प्रकाश डालता है।

निष्कर्ष:

  • यद्यपि नारीवादी अंतर्राष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों ने लोकप्रियता हासिल की है फिर भी वे पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनने में पर्याप्त सफल नहीं हुए हैं। पर्यावरण नीतियों और गैर-राज्य अभिकर्त्ताओं द्वारा वैश्विक क्षेत्र में और भी बड़ी भूमिका निभाने के साथ नारीवादी सिद्धांतों में वास्तविक दुनिया के समाधानों का विश्लेषण और उन्हें पेशकश करने की बहुत अधिक क्षमता है। 

स्रोत: द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

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महालनोबिस का दृष्टिकोण: भारत के बिग डेटा और AI चुनौतियों का हल

प्रिलिम्स के लिये:राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस, प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस, बिग डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसपद्म पुरस्कारदूसरी पंचवर्षीय योजनाडिजिटल इंडिया, कौटिल्य का अर्थशास्त्रमेन्स के लिये:भारत के बिग डेटा और AI चुनौतियों से निपटने के लिये महालनोबिस की अंतर्दृष्टि

चर्चा में क्यों?  

भारत के ‘प्लान मैन’ के रूप में प्रसिद्ध प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस के जन्मदिन के उपलक्ष्य में भारत में 29 जून को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस मनाया गया।

  • आज के समय में हम भारत को बिग डेटा की चुनौतियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की परिवर्तनकारी शक्ति से जूझते हुए देख सकते है, ऐसे में महालनोबिस का दृष्टिकोण और उनकी अंतर्दृष्टि भारत को इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से हल करने में मदद कर सकती है।

प्रशांत चंद्र महालनोबिस के प्रमुख योगदान:

  • परिचय:
    • प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस एक प्रमुख वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद् थे जिन्होंने राष्ट्रीय विकास के लिये डेटा संग्रह, विश्लेषण तथा योजना निर्माण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
    • उनका जन्म कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनके दादा गुरुचरण एक समाज सुधारक और रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देबेंद्रनाथ टैगोर के अनुयायी थे। 
  • प्रमुख योगदान: 
    • वर्ष 1931 में उन्होंने सांख्यिकी और संबंधित विषयों में अनुसंधान एवं शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कलकत्ता में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) की स्थापना की थी।
      • उन्होंने वर्ष 1933 में पहली भारतीय सांख्यिकीय पत्रिका ‘सांख्य’ की भी स्थापना की थी।
    • वर्ष 1955 में उन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत के योजना आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था।
      • उन्होंने दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) में औद्योगीकरण और आर्थिक विकास के लिये भारत की रणनीति को डिज़ाइन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसे गणितीय मॉडल के आधार पर महालनोबिस योजना के रूप में भी जाना जाता है। इस योजना में भारी उद्योगों और पूंजीगत वस्तुओं पर बल दिया गया था। 
    • इसके साथ ही रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना तथा उसे आकार देने में भागीदारी उनके महत्त्वपूर्ण योगदान को उजागर करती है।

भारत के बिग डेटा और AI संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिये महालनोबिस दृष्टिकोण क्या अंतर्दृष्टि प्रदान करता है? 

  • AI और महालनोबिस प्रभाव को विनियमित करना:
    • चूँकि AI नौकरी विस्थापन, गलत सूचना के प्रसार और अन्य नैतिक चिंताओं जैसी चुनौतियाँ पेश करता है, इसलिये इसके विनियमन के लिये वैश्विक दबाव है।
    • डेटा अखंडता सुनिश्चित करने में महालनोबिस की दूरदर्शिता उनके सर्वेक्षणों में अंतर्निहित क्रॉस-चेक के प्रावधान से देखी जाती है, जो कौटिल्य के अर्थशास्त्र से प्रेरित थे।
    • महालनोबिस दृष्टिकोण हमें AI एल्गोरिदम में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने, कठोर डेटा प्री-प्रोसेसिंग के महत्त्व की याद दिलाता है।
      • उदाहरण के लिये भर्ती प्रक्रियाओं में AI की तैनाती करते समय सभी उम्मीदवारों के लिये समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु पूर्वाग्रहों का आकलन करना और उन्हें कम करना महत्त्वपूर्ण है।
    • महालनोबिस दृष्टिकोण ज़िम्मेदार और समावेशी AI सिस्टम के सृजन हेतु ऐसी चुनौतियों का सामना करने और संबोधित करने की आवश्यकता पर ज़ोर देता है।
  • अनेक डेटा स्रोतों का एकीकरण:
    • महालनोबिस ने अर्थव्यवस्था और समाज का समग्र दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिये विविध डेटा स्रोतों को एकीकृत करने की वकालत की।
    • बिग डेटा और AI के संदर्भ में इसका तात्पर्य संरचित और गैर-संरचित डेटा, सोशल मीडिया फीड, सैटेलाइट इमेजरी तथा सेंसर डेटा सहित विभिन्न डेटा प्रवाह को शामिल करना है।
      • इस तरह का एकीकरण व्यापक विश्लेषण की सुविधा प्रदान कर सकता है और नवीन अनुप्रयोगों को सक्षम कर सकता है।
      • उदाहरणतः कृषि क्षेत्र हेतु मौसम संबंधी डेटा, उपग्रह इमेजरी और किसान-जनित डेटा का संयोजन फसल स्वास्थ्य, कीट प्रकोप तथा इष्टतम सिंचाई प्रथाओं पर मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकता है।
    • यह दृष्टिकोण सटीक कृषि, फसल की पैदावार और किसानों की आजीविका में सुधार जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता-संचालित समाधानों के विकास को सक्षम बनाता है।

सांख्यिकीय मॉडल का महत्त्व:

  • महालनोबिस ने सार्थक निष्कर्ष और पूर्वानुमान हेतु सांख्यिकीय मॉडल के महत्त्व पर ज़ोर दिया।
  • बिग डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में उन्नत मशीन लर्निंग एल्गोरिदम और पूर्वानुमानित मॉडलिंग तकनीक विशाल डेटासेट का विश्लेषण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • इन मॉडलों को स्वास्थ्य देखभाल, वित्त और शहरी नियोजन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में नियोजित किया जा सकता है।
  • उदाहरण के लिये स्वास्थ्य देखभाल डेटा पर पूर्वानुमानित मॉडल लागू करके नीति निर्माता जनसंख्या स्वास्थ्य प्रवृत्ति की पहचान कर सकते हैं, बीमारी के प्रकोप का पूर्वानुमान लगा सकते हैं और संसाधनों को प्रभावी ढंग से आवंटित कर सकते हैं।
    • यह दृष्टिकोण साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने और सक्रिय हस्तक्षेप की सुविधा प्रदान करता है। 
  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  प्रश्न. विकास की वर्तमान स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)औद्योगिक इकाइयों में विद्युत की खपत कम करना   सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना   रोगों का निदान   टेक्स्ट-से-स्पीच (Text-to-Speech) में परिवर्तन   विद्युत ऊर्जा का बेतार संचरणनीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:(a) केवल 1, 2, 3 और 5
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5उत्तर: (b)प्रश्न. भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के संदर्भ में भारी उद्योगों पर कम और बुनियादी ढाँचे पर अधिक ज़ोर देने के साथ औद्योगिकीकरण के पैटर्न में बदलाव शुरू हुआ: (2010)(a) चतुर्थ योजना
(b) छठी योजना
(c) आठवीं योजना
(d) दसवीं योजनाउत्तर: (b) 

स्रोत: द हिंदू 

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